The Appetite for Profit, the Chessboard of Power, and the Eroding Trust in Science
The editorial highlights a global crisis of institutional trust, particularly in the UK, where public confidence in politicians, media, and the judiciary has hit historic lows. While science remains a unique beacon of shared optimism and pride, data reveals that this trust is fragile; the percentage of people who trust science "a lot" has plummeted from 63% in 2020 to just 34% today. This rising skepticism is not driven by ignorance, but by an over-aware and conscious public that perceives science as becoming a tool for corporate profiteering and political manipulation (such as vote manipulation through algorithms and data science, often highlighted by the handling of the COVID-19 pandemic). The piece concludes that science is losing its most valuable asset—its moral neutrality. To restore its integrity, scientific institutions must ensure absolute transparency in funding and decouple themselves entirely from the pressures of capitalism and political agendas, reaffirming that the ultimate goal of science is the elevation of humanity, not the service of power or profit.
Keywords:Science and Trust, Eastern Scientist Editorial, Public Trust in Science, Corporate Profiteering in Science, Political Manipulation of Science.
आज दुनिया के कई देश गहरे अविश्वास के अभूतपूर्व संकट से जूझ रहे हैं और यूनाइटेड किंगडम सहित वैश्विक स्तर पर हुए हालिया सर्वेक्षण यह साफ बताते हैं कि जनता का राजनेताओं, व्यापार, पत्रकारिता, पुलिस और न्यायपालिका जैसी बुनियादी संस्थाओं से भरोसा पूरी तरह उठ चुका है। इस अंधकारमय माहौल में केवल विज्ञान ही एक ऐसी संस्था के रूप में बचा है जो आज भी व्यापक सम्मान और उम्मीद जगाए हुए है, जहाँ एक तरफ राजनेताओं का 'नेट ट्रस्ट स्कोर' गिरकर -75% हो चुका है, वहीं वैज्ञानिकों का स्कोर +58% पर मजबूत है, और जब लोगों से उनकी उम्मीदों के बारे में पूछा जाता है तो चिकित्सा विज्ञान में प्रगति, नई तकनीक और नवाचार ही भविष्य के प्रति साझा गर्व के शीर्ष स्रोत बनकर उभरते हैं। लेकिन विज्ञान की यह मजबूत स्थिति जितनी दिखती है, उससे कहीं अधिक नाजुक है क्योंकि डेटा की परतों को खंगालने पर एक हैरान करने वाली कहानी सामने आती है जिसके अनुसार विज्ञान पर 'बहुत अधिक' भरोसा करने वाले लोगों की संख्या जो 2020 में 63% थी, वह अब घटकर मात्र 34% रह गई है, और भले ही विज्ञान के प्रति कुल धारणा अब भी सकारात्मक हो, लेकिन समाज के सबसे संदेहास्पद और सबसे आश्वस्त समूहों के बीच भरोसे की खाई 60 प्रतिशत अंकों तक चौड़ी हो चुकी है जो यह साफ संकेत देती है कि कुछ विशेष समूहों में आत्मविश्वास की जगह अब गहरी सतर्कता ने ले ली है।
यह उभरता हुआ अविश्वास किसी अज्ञानता या अंधविश्वास की उपज नहीं है, बल्कि यह समाज के एक जागरूक, पढ़े-लिखे और प्रबुद्ध वर्ग की 'अति-जागरूकता' का परिणाम है जो विज्ञान को केवल प्रयोगशालाओं के बंद कमरों में होने वाले जन-कल्याणकारी चमत्कारों के रूप में नहीं देख रहा, बल्कि इसके पीछे छिपे निहित स्वार्थों को भी पहचान रहा है। जनता स्पष्ट रूप से देख रही है कि कैसे कॉर्पोरेट फंडिंग के दम पर वैज्ञानिक निष्कर्षों को प्रभावित किया जाता है और जब बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियां, तकनीकी दिग्गज या जीवाश्म ईंधन के साम्राज्य अपने व्यावसायिक हितों के अनुकूल शोध प्रायोजित करते हैं, तो विज्ञान की वस्तुनिष्ठता पर सवाल उठना लाजिमी हो जाता है क्योंकि डेटा को छिपाना, मनमाफिक नतीजों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना और जन-स्वास्थ्य पर व्यावसायिक लाभ को तरजीह देना 'पैसे के खेल' और 'वैज्ञानिक अनुसंधान' के बीच की रेखा को धुंधला कर देता है। दूसरी ओर, आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की राजनीति ने इस संकट को और गहरा किया है जहाँ डेटा साइंस, बिहेवियरल साइकोलॉजी और एल्गोरिदम का इस्तेमाल जनहित के लिए कम और मतदाताओं के दिमाग को नियंत्रित करने के लिए अधिक हो रहा है, और सोशल मीडिया पर कृत्रिम धारणाओं का निर्माण करके, 'साइकोलॉजिकल प्रोफाइलिंग' के जरिए चुनावी गणित साधने और वैज्ञानिक तर्कों की आड़ लेकर अपने राजनीतिक एजेंडे को थोपने से सरकारों की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं, जिसकी बानगी कोविड-19 महामारी के दौरान वैज्ञानिक दिशानिर्देशों और राजनीतिक सहूलियतों के घालमेल में साफ देखी जा चुकी है।
आज का सबसे बड़ा संकट यही है कि विज्ञान अपनी सबसे मूल्यवान संपत्ति यानी अपनी नैतिक निष्पक्षता खो रहा है, और जब विज्ञान जन-कल्याण के बजाय पूंजीपतियों की तिजोरी भरने और राजनेताओं की सत्ता बचाने का माध्यम दिखने लगे, तो उसकी प्रामाणिकता की नींव पूरी तरह हिल जाती है। हमारा यह सुदृढ़ मानना है कि यदि विज्ञान को अपनी इस दरकती हुई साख को बचाना है, तो उसे खुद को पूंजीवाद के अंधाधुंध मुनाफे और सत्ता की राजनीति के दो पाटों से पूरी तरह मुक्त करना होगा क्योंकि सार्वजनिक सहमति और अटूट विश्वास के बिना वैज्ञानिक अनुसंधान कभी फल-फूल नहीं सकते। यह भरोसा तब तक बहाल नहीं होगा जब तक अनुसंधान संस्थान अपनी फंडिंग के स्रोतों को शत-प्रतिशत पारदर्शी नहीं बनाते, और जब तक वैज्ञानिक हर प्रकार के राजनीतिक या व्यावसायिक दबाव से ऊपर उठकर परम सत्य को समाज के सामने रखने का साहस नहीं दिखाते, ताकि दुनिया को यह विश्वास दिलाया जा सके कि विज्ञान का अंतिम लक्ष्य किसी का बैंक बैलेंस या वोट बैंक बढ़ाना नहीं, बल्कि समूची मानवता का उत्थान है।
Dr. R. Achal Pulastey
Editor-in-Chief, Eastern Scientist
He is a multifaceted scholar with a keen insight into—and a research focus on—socio-cultural, folkloric-literary, economic, and geopolitical changes.
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